और ये रहा नये साल के तरही मुशायरे के लिये मिसरा 'न जाने नया साल क्या गुल खिलाए' बहरे मुतकारिब पर एक गैर मुरद्दफ मिसरा
पिछली बार का तरही मुशायरा काफी शानदार रहा है और उसके बाद से ही ग़ज़ल की कक्षाओं में कुछ सुस्ती आ गई है । किसी भी सफल आयोजन के बाद ऐसा होता ही है कि कुछ दिनों के लिये मन कुछ करने को नहीं होता है । ग़ज़ल की कक्षाओं में वैसे तो हम काफी कुछ काम करते ही...
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पंकज सुबीर
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[06 Dec 2009 22:06 PM]



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