सम्भव नहीं कल्पना को अब

गीत कलश संभव नहीं रहा लिख पाऊँ गीत नया कोई शतरूपे क्योंकि कल्पना के पाखी के पंख किसी ने नोच लिये हैं ये बहेलिया वक्त न जाने क्या मंतव्य लिये आया है कैद कर रहा अरमानों के पल पल पंछी कई, जाल में एक साध ज्यों करवट लेकर आतुर होकर पंख तौलती उसे बांध कर रख लेता है... [पूरी पोस्ट]
writer राकेश खंडेलवाल
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[06 Dec 2009 21:20 PM]

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