कीर्ति चाहिए तो कुकूर बनिए
सन्दर्भ बताना ज़रूरी तो नहीं पर प्रबुद्ध पाठक समझ ही जायेंगे... इस बार पढ़िए बोधिसत्व की कविता ) मधुरी बानी बोल देस समूचा आज सेठों के हाथ में है... जो बचा है वो जेब में है काँख में है संस्कृति संगठन पर शोहदों का जाल है वे कुछ करते नहीं...देश का यही हाल...
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अशोक कुमार पाण्डेय
बोधिसत्व
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[06 Dec 2009 14:01 PM]



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