गेरुआ : चार व्यंग्यचित्र
गेरुआ : चार व्यंग्यचित्र घनाक्षरी में आज चौथा रासलीला प्रिय मुझे, जीवन भी रास लगे, इसीलिये क्षण-क्षण, रास रचा लेता हूं. रुक्मिणी अपनी को, रखता हूं घर में ही, बाहर तो बाहर की, राधा नचा लेता हूं. चाहे गिरे बिजली, पहाड़ टूट जाये पर, फिर भी मैं खुद को, ह...
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योगेन्द्र मौदगिल
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[06 Dec 2009 11:26 AM]



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