गजल
हर सतह पर इस जमीं के खून के छींटे पड़े हैं, पांव रखें किस जगह पर पशोपेश में हम खड़े हैं। कल चले थे शेर बनने आज मांदों में घुसे हैं, हर किसी के हाथ अब तो सिर्फ़ नारों से रंगे हैं। भूख आंतों से निकल कर आज संसद में खड़ी है, पेट की भाषा भी शायद राजनेता बन चु...
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creativekona
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[06 Dec 2009 10:00 AM]



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