आशाओ मेरी ! कब तक मेरा साथ दोगी ?

अपूर्ण समय के भंवर को ,कठिन हर लहर को तुम्हारे ही दम पे तरा हूँ , जिया हूँ, लड़ा हूँ समय से ! जब चल पड़ा हूँ हर पथ पे मेरे पथ की प्रदर्शक ! जीवन की गति की अनूठी है भाषा, मन की तरंगों से अपनी उमंगों को, मैंने छुआ है तुम्हारे ही दम से , सुप्त मन में तुम दीप्त... [पूरी पोस्ट]
writer निपुण पाण्डेय
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[06 Dec 2009 06:50 AM]

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