दबी चिंगारी को हवा मत दो............६ दिसम्बर

zakhm मरा इक शख्स था हुए बरबाद न जाने कितने थे उस एक चेहरे को ढूंढती निगाहें आज न जाने कितनी हैं गम का वो सूखा ठहरा आज भी हर इक निगाह में है सियासत की ज़मीन पर बिखरी लाशें हजारों हैं राम के नाम पर राम की ज़मीन हुई लाल है धर्म के नाम पर ठगी ज़िन्दगी आज नारा... [पूरी पोस्ट]
writer वन्दना
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[06 Dec 2009 06:23 AM]

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