बंद आँखें....

अपूर्ण खुली आँखों से तो दिखता है सब ! पर इन दिनों बंद आँखों से देख लेता हूँ कहीं ज्यादा | खुली आँखें ! दिखाती हैं सच | और बंद आँखें ? दिखा देती हैं उस सच के भी भीतर, शायद अपना सच | सुना था बंद आँखें देखती हैं स्वप्न , अवास्तविक और भंगुर ! लेकिन... मेरी दुनि... [पूरी पोस्ट]
writer निपुण पाण्डेय
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[06 Dec 2009 03:10 AM]

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