जीत लो चाहे अवनि आद्यान्त तक ..[कविता] श्रीकान्त मिश्र 'कान्त',
जीत लो चाहे अवनि आद्यान्त तक जीत ना पाओ मुझे तुम कभी भी अरे मैं तो ‘तत्व’ हूँ क्या ‘व्यवस्था’ से मुझे लेना है ‘पंच तत्वों' की निरी भंगुर महा इस सृष्टि से, आद्यान्त अभिनव ब्रह्म से मैं परे हूँ ….. बंधे हो तुम इन्द्रियों की पाश में, यों ही पा सकोगे न क...
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श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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[06 Dec 2009 02:46 AM]



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