ग़ज़ल - अपने हाथों मुकद्दर बना कब सके
अपने हाथों मुकद्दर बना कब सके और ख़ुद को सिकंदर बना कब सके हम, फ़क़ीरों की दुनिया में आ तो गए ख़ुद को लेकिन कलंदर बना कब सके हम सभी ने मकां तो बनाये मगर हम मकां को कभी घर बना कब सके पत्थरों के नगर में रहे घूमते मील का ख़ुद को पत्थर बना कब सके मन तो क...
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kavideepakgupta
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[05 Dec 2009 22:46 PM]



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