क्षणिकाएँ-१

अनुभूति कलश १- सूरज,चाँद,तारे, रोज निकलते हैं आसमां में, फिर भी जाने क्यों झोपड़ी में , उजाला नहीं होता। २- सदियों तक कोई किसी से रूठता नहीं, पर न जाने क्यों खुदा रूठा है गरीब से। ३- माना कि नासमझ थी मैं, समझ सकी न तुझको, क्या तुमने भी, मुझे समझने की, ज़रूरत नही... [पूरी पोस्ट]
writer ramadwivedi

क्षणिकाएंक्षणिकाएँ-१

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[05 Dec 2009 22:45 PM]

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