ग़ज़ल
टीवी पर दिखाई गई बाढ़ की तस्वीरों ने लिखवाई ये ग़ज़ल अब के कुछ ऐसे यहाँ टूट के बरसा पानी ले गया साथ में बस्ती भी ये बहता पानी मेरी आंखों के हर इक ख्वाब ने दम तोड़ दिया उन की ताबीर को दो लम्हा न ठहरा पानी चंद बूँदें भी नहीं प्यास बुझाने के लिए यूँ तो ताह...
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इस्मत ज़ैदी
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[09 Oct 2009 12:18 PM]



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