dharti ki pukar

Ismat Zaidi मैं , पावन धरती का बेटा, इसके आँचल में मैं खेला , अन्नपूर्ण है ये मेरी, नर्म बिछौना इस की गोदी. बापू को देखा करता था, भोर में उठ कर खेत को जाना, अम्मां k a खाना ले जाना , साथ बैठ कर भोजन खाना . गाँव की ऐसी स्वच्छ हवाएं , कुँए का पानी घिरी घटाएं, चारो... [पूरी पोस्ट]
writer इस्मत ज़ैदी
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[16 Oct 2009 00:01 AM]

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