Ismat Zaidi "Shefa kajgaonvi
अक्सर यहाँ वहां होने वाले दंगों के बाद लगी आग ने ये लिखने पर मजबूर किया मजबूरी इसलिए क्योंकि ऐसी ग़ज़लें खुशी में नहीं लिखी जातीं । आग ही आग है हर सिम्त बुझाओ लोगो जल रहे बस्ती में इन्सान बचाओ लोगो दुश्मनी खत्म हो और दोस्ती का हाथ बढे हो सके गर तो ये...
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इस्मत ज़ैदी
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[01 Nov 2009 12:12 PM]



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