मुट्ठी भर रेत
हँसतीं हुई, लडखडाती हुई , माँ की नज़रों से छिपकर घर से बाहर भागती हुई मैं दौड़ चली जाती थी खेतों में नए खेलों को तलाशती हुई रिमझिम, टिमटिम वो आशा वो नताशा मिट्टी में घरौंदें बनाया करते थे अपने उन घरौंदों में एक संसार बसाया करते थे गुड्डे गुड्डियों की...
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Shobhna Choudhary
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[04 Dec 2009 06:48 AM]



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