न सूर्य बन सकें अगर, चराग बन जला करें।
पिछली पोस्ट में किये गए वादे के मुताबिक हाज़िर हूँ एक नयी ग़ज़ल के साथ, जो गुरु जी के आशीर्वाद से कृत है. उठो के कुछ नया करें। ज़मीं को फिर हरा करें। जो प्यार से मिले उसे मुहब्बतें अता करें। न सूर्य बन सकें अगर चराग बन जला करें। हुआ हो गर बुरा भी तो पल...
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अंकित "सफ़र"
ग़ज़ल
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[04 Dec 2009 03:56 AM]



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