लेकॉनिक टिप्पणी का अभियोग

ज्ञानदत्त पाण्डेय की मानसिक हलचल श्रीश पाठक “प्रखर” का अभियोग है कि मेरी टिप्पणी लेकॉनिक (laconic) होती हैं। पर मैं बहुधा यह सोचता रहता हूं कि काश अपने शब्द कम कर पाता! बहुत बार लगता है कि मौन शब्दों से ज्यादा सक्षम है और सार्थक भी। अगर आप अपने शब्द खोलें तो विचारों (और शब्दों) की ग... [पूरी पोस्ट]
writer ज्ञानदत्त G.D. Pandey

Hindi

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[03 Dec 2009 17:36 PM]

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