सुन मेरे बंधू रे, सुन मेरे मितवा, सुन मेरे साथी रे
सचिन्द्र देव बर्मन, ये नाम मेरी पिछली पोस्ट पर चमक रहा था. अब भी मेरे मन में घुला घुला सा, गुनगुनाया सा नाच रहा है. कुछ भी लिख दूं, उनके लिये अधूरा सा लगता है. और तो और, जब उनकी धुनों पर रचे गये गीत जब मैं गुनगुनाता हूं, तो वे खुद मुझमें परकाया प्रवे...
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दिलीप कवठेकर
दिलीप के दिल से
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[03 Dec 2009 14:54 PM]



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