अवधी उपन्यास - क़ासिद (3)
दादी केरे लोटा के पानी क धार पर टिल्लू क्यार कान लाग हैं। जैसे हे पानी खत्म भा टिल्लू तुरतै छति के याक कोना म टोकरी म धरे पटाखा क्यार बरसाती हटावन लाग, जेहिते यू जानि परे कि पटाखन कइहां धूप दिखावे खातिर इ ऊपर आए हैं। दादी कनखिन तेरे इ लरिकवा केरि हर...
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पंकज शुक्ल
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[03 Dec 2009 11:14 AM]



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