कविता : कब्र में दाखिल होता आदमी ...

कुछ औरों की , कुछ अपनी ... साथियों !           आज हम इतने अजीब वक़्त के हमसफ़र बने हुए हैं , जहाँ हमारे अहसास  दिनों-दिन मर रहे हैं | मुझे समझ में नहीं आता कि हम ही अजीब हैं या वक़्त | पर  सच्चाई तो यही  है  | जबकि आज हम द... [पूरी पोस्ट]
writer अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
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[03 Dec 2009 10:33 AM]

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