जो मार खा रोईं नहीं
विष्णु खरे की कविता ‘जो मार खा रोईं नहीं’ का एक ख़याल-पाठ हिंदी कविता के पारंपरिक काव्य-आस्वादन-पठन-अभिरुचियों की रूढ़ता को विष्णु खरे की कविता जिस तरह-जितनी बार-जितने तरीक़ों से तोड़ती है, उनकी कविता के बारे में उतने ही रूढ़ शब्द-क्रम में बात की...
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Geet Chaturvedi
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[03 Dec 2009 03:21 AM]



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