मुझको कब वक्त मिला
मुझको कब यह वक्त मिला " मुझको कब यह वक्त मिला कि सोच सकूँ क्या है भला और क्या बुरा है मेरे जीवन की इस तन्हाई मे । मैं कहाँ समझ पाई अपने अन्दर के उन भावों को जो समझूं भी तो कैसे करूँ मैं सिंचित उन ख्वाहिशों को । पाई ख़ुद को वीराने में सोची उसको क्षणिक...
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Kusum Thakur
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[03 Dec 2009 01:06 AM]



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