कल्पनायें सारी……….
कल्पनायें सारी जीवन की सोच बन कर रह गई ।
जिन्दगी मुझ पर मैं जिन्दगी पर बोझ बन कर रह गई ।
महल टूटे सारे आरजू हर रेंत का ढेर बन कर रह गई ।
धूप से भागे तो छाँव मैं सर्द आहें मिली ,
दुनिया एक धूप छाँव का खेल बन कर रह गई ।
संगीत खामोशी का है , [...]...
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hemjyotsana "Deep"
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[02 Mar 2007 01:37 AM]



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