खिज़ां को बुलाने चलो

लम्हें जिन्दगी के हर फ्रिक्र-ए-ज़हां को दिल से भुलाने चलो । चलो ख़्वाब में सूकून की नींद सोने चलो । खिज़ा में भी रंगो को याद रखना सदा , मौसम-ए-ग़म में भी , खुशी को पाने चलो । राहतों के शहर की तलाश में मर ना जाना , आफतों के जहां में ही , घर बसाने चलो । खिज़ा के बिन बहार क... [पूरी पोस्ट]
writer hemjyotsana "Deep"

deepchand sher

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[01 Sep 2007 16:09 PM]

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