अनुभूति
हर अनुभूति परिभाषा के पथ पर बढे- यह आवश्यक नहीं, शब्दों की भी होती है एक सीमा, कभी-कभी साथ वे देते नहीं, इसलिए बार -बार मिलने व कहने पर, यही लगता है जो कहना था, कहां कहा? ‘प्रेम’ ऐसी ही इक ‘अनुभूति’ है, वह मोहताज नहीं रिश्तों...
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ramadwivedi
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[01 Nov 2006 22:02 PM]



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