प्रेम जिजीविषा का विकास है
प्रेम’ दिल की पुकार है, ह्रिदय का विस्तार है, स्वप्निल संसार है, रस की फ़ुहार है, तन-मन झूम जाता है, गीत बन जाता है। ‘प्रेम’ जिजीविषा का विकास है, जीवन का प्रकाश है, अधरों का उल्लास है, रागात्मकता का विलास है, मन-मयूर नाच उठता है, गी...
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ramadwivedi
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[02 Dec 2006 07:20 AM]



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