प्रियंकर की एक कविता
महास्वप्न
कुछ सुना तुमने
प्यार की हवाओं ने अब रुख बदल लिया है
स्नेह की नदी अब अपने चतुष्कोणीय प्रवाह के साथ
हमारी ओर मुड़ चली है
खेतों में प्यार की फसल लहलहा रही है कुछ सुना तुमने
जमीन की तासीर बदल गई है
अब कुछ भी बोओ फसल प्यार की ही उगेगी
स्न...
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PRIYANKAR
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[02 Nov 2006 10:04 AM]



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