उम्मीद

थोड़ी सी ज़मीन, थोड़ा सा आसमान एक ख़त में लिख भेजा है आज मैंने अपने मन का हाल. पर दूरियां इतनी हैं की मेरा संदेस तुम तक पहुचेगा कैसा? आज अपने ख़त को एक प्लास्टिक में बंद कर एक डिबिया में बंद कर मैंने गंगा में बहा दिया है यही सोच की यहाँ गंगा बहती है और वहां थेम्स नदी. कभी न कभी कि... [पूरी पोस्ट]
writer Surbhi
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[02 Dec 2009 11:48 AM]

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