अरे! तुम कब आए...

मौत भी शायराना चाहता हूँ..! सुबह के लगभग सवा पांच बज रहे थे, हवा की सरसराहट सीधे कानों से टकरा रही थी, पक्षियों का झुण्ड नीले आसमान की सुन्दरता बढ़ा रही थी, सूरज की लालिमा अपने चरम पर थी और आसपास के वातावरण में स्वर्णिम प्रकाश फ़ैल रहा था, ऊपर आसमान में नज़रें उठाकर देखने पर एसा... [पूरी पोस्ट]
writer रामकृष्ण गौतम
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[02 Dec 2009 10:52 AM]

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