साथ
न उदात्त प्रेम, न अतिसय घृणा , न मिलन की उत्कट अभिलाषा, न वियोग का अत्यन्त क्लेश, फ़िर भी हम सब हैं सहयात्री , इस काल खंड में, यह नियति का है आर्शीवाद , या है अभिशाप, यह तो निर्धारित होगा , यात्रा में हमारे आचरण पर |...
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विजय प्रकाश सिंह
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[02 Dec 2009 03:03 AM]



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