शाम को सोने के, पहले पिता हुँ कि,
शाम को सोने के, पहले पिता हुँ कि, भूल सकू दिन कि उठाई गई तकलीफो को जिससे मिला शाम का भोजन भूल सकू बेवजह कि गलियों को, जिसका हक़दार मैं नहीं भूल सकू मेह्न्ताना कि कमी को जिसका हक़दार मैं हुँ भूल सकू सर पर छत नहीं भूल सकू बचा स्कुल जाना चाहता है भुल सक...
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"Azad Sikander"
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[02 Dec 2009 02:17 AM]



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