चंद अधुरे ख्यालात
अक्सर ऐसा होता है कि चलते फ़िरते, उठते बैठते कुछ ख्यालात उभर आते हैं जो शायद अधुरे होते हुये भी अपने आप में पूरे होते हैं... उनमें चाह कर भी और कुछ जोड पाना मुमकिन नहीं हो पाता. ऐसे ही कुछ ख्यालात पेश हैं सरपर्स्ती में कांटों की रहती हो
बुरा न मानो तो...
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मोहिन्दर कुमार
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[02 Dec 2009 02:05 AM]



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