छल

रचना रवीन्द्र छल शांत मन में उठती लहरें कभी ऊँची, कभी निष्प्राण, कभी उद्विग्नता की हद को पर करती जाने क्यों रहने लगी बीमार मैं जाने किस किस से बेचार मैं साधने को इस असाध्य रोग जाने कितने पीर, हकीम, अल्लाह वल्लाह ! बदल डाले मैंने और इक तुम थे कि छलते रहे मुझे सारी... [पूरी पोस्ट]
writer रचना दीक्षित

निष्प्राण

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[02 Dec 2009 01:48 AM]

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