यहाँ से वहां तक कैसा इक सैलाब है
यहाँ से वहां तक कैसा इक सैलाब है मेरे तो चारों तरफ आग ही आग है!! कितनी अकुलाहट भरी है जिन्दगी हर तरफ चीख-पुकार भागमभाग है!! अब तो मैं अपने ही लहू को पीऊंगा इक दरिंदगी भरी अब मेरी प्यास है!! मेरे भीतर तो तुम्हे कुछ नहीं मिलेगा मुझपर ऐ दोस्त अंधेरों का...
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gargi gupta
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[02 Dec 2009 00:21 AM]



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