गुलाबी पतझड़
कुनमुनी रातें अलाव सिकी यादें, कुलमुलाती हैं सखी की बातें ठौर-ठौर पिये चाँदनी का दोना लिये, मढ़ती रात तारों के धागे लिये पोरों पर कसती रानी कहानी रचती, सूखी पीली पत्ती अम्बर पर लिखती मन गुंथी सांझ झर गए पात-पात, गुलाबी पतझड़ जाए सखी घर याद आए।...
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रजनी भार्गव
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[01 Dec 2009 23:47 PM]



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