न जाने क्यों

गुलमोहर का फूल तुम्हारी गीली खुशबू भरती गयी अन्दर तक मेरे फेफड़ों में । विसरित होती गयी धमनियों में । न जाने क्यों बहुत हीं तकलीफ़ होती है आजकल सांस लेने में । आदमी इतनी आसानी से मरता भी क्यों नहीं ।... [पूरी पोस्ट]
writer चंदन कुमार झा
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[01 Dec 2009 13:59 PM]

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