ग़ज़ल - वक़्त के साथ चलने लगा हूँ
वक़्त के साथ चलने लगा हूँ धीरे- धीरे संभलने लगा हूँ बात कोई तो है मुझमें जो मैं उनकी नज़रों में खलने लगा हूँ आईने को शिकायत है मुझसे रोज़ चेहरा बदलने लगा हूँ ज़िन्दगी को समझने की खातिर दोस्तो, ख़ुद को छलने लगा हूँ नर्म लहज़ा हुआ जब से मेरा तब से शोलों...
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kavideepakgupta
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[01 Dec 2009 07:35 AM]



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