क्या हुआ गर ला इलाज हूँ,
गुज़रा है ज़माना इस बंद कमरे में टूटे हैं पंख मेरे फड-फाड़ा के बंद कमरे मे. क्या हुआ गर ला इलाज हूँ, स्वप्न नहीं रुके हैं मेरे इस बंद कमरे मे. सींचता हूँ रूह अपनी अनगिनत उन यादों से शब् टपकती है कमल पे डब-डबती उन यादों से. क्या हुआ गर ला इलाज हूँ, यादे...
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●๋• नीर ஐ
My Poems
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[01 Dec 2009 06:31 AM]



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