अल्लामा इकबाल : बच्चों के लिए (३) : हमदर्दी

शैशव टहनी पे किसी शजर* की तनहा बुलबुल था कोई उदास बैठा कहता था की रात सर पे आई उड़ने चुगने में दिन गुज़ारा पहुँचूँ किसी तरह आशियाँ* तक हर चीज़ पे छा गया अन्धेरा सुनकर बुलबुल की आहो ज़ारी* जुगनू कोई पास ही से बोला हाज़िर हूँ मदद को जानो-दिल से कीड़ा हूँ अगरचे... [पूरी पोस्ट]
writer अफ़लातून

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[01 Dec 2009 01:59 AM]

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