काँच की बरनी और दो कप चाय

दिल का दर्पण -  परावर्तन जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी - जल्दी करने की इच्छा होती है , सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं , उस समय ये बोध कथा , " काँच की बरनी और दो कप चाय " हमें याद आती है । दर्शनशास्त्र... [पूरी पोस्ट]
writer मोहिन्दर कुमार
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[30 Nov 2009 00:06 AM]

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