बिस्तर ज़मीं को,बांह को तकिया बना लिया
यूं हसरतों का दायरा हद से बढ़ा लिया खुशियों को जिन्दगी से ही अपनी घटा लिया खुद पर भरोसा था तभी, उसने ये देखिये दीपक हवा के ठीक मुकाबिल जला लिया हम से फकीरों को कहीं जब नींद आ गयी बिस्तर ज़मीं को,बांह को तकिया बना लिया शिद्दत से है तलाश मुझे ऐसे शख्...
[पूरी पोस्ट]
नीरज गोस्वामी
45
5
0
5
25
[29 Nov 2009 23:46 PM]



Shuffle








