हम जब दुबारा मिले !

दस्तावेज ५ वर्ष पूर्व डायरी में लिखी गई ये कविता मैंने बिसरा दी थी ) हम एक बार फिर उससे मिले इन सर्दियों में तमाम बारिश मै अपने शहर छोड़ आया था बेहिसाब धुंधलके उसने अपने दरवाजे पर टांग रखे थे धुंधलके को धोखा देकर अन्दर झाँक रही मेरी आँखें जब तक पिघलती उसने तपा... [पूरी पोस्ट]
writer आवेश
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[23 Nov 2009 11:27 AM]

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