झूठमेव जयते !
समाज बदल रहा है, प्रगति और आधुनिकता के रास्ते पर तेज़ सफर शुरू कर चुका है। सच से पर्दा उठ गया है। धर्मशास्त्रों ने तमाम फंसाए रखा। हजारों साल तक झांसे में रखा। अब प्रगतिशील दुनिया समझदार हो गई है। सब जान चुके हैं कि झूठ बराबर सांच नहीं और सांच बराबर...
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मधुकर राजपूत
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[28 Nov 2009 23:45 PM]



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