मेरी याद में देखना परेशाँ तुम होगे - ग़ज़ल
अभी हाल ही में मेरे किसी शुभचिंतक ने मुझे मुफ्त की सलाह बांटने पर अपनी नाराजगी जाहिर की है. मैं परेशान, आख़िर मान लिया की गलती मेरी ही है. जाने अनजाने कुछ शे'र लिखे चले गए. आज की यह ग़ज़ल उसी शुभचिंतक के नाम पेश है - अपनी जमीं के वास्ते आसमां तुम होग...
[पूरी पोस्ट]
सुलभ सतरंगी
ग़ज़ल
27
4
0
4
5
[28 Nov 2009 11:05 AM]



Shuffle








