उजाले और धुँधलाए

bhardwaj'sblog किसी वीरान में भटका हुआ राही किधर जाए; न कोई रास्ता सूझे न मंज़िल ही नज़र आए। बदन की चोट तो इंसान सह लेता सहजता से, लगे मन पर तो शीशे सा चटक कर वह बिखर जाए। घुमड़ते ही रहे दिल में किसी की याद के बादल, उसाँसॉं से न उड़ पाए न आँसू बन बरस पाए। अगर रेखागणि... [पूरी पोस्ट]
writer chandrabhan bhardwaj
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[28 Nov 2009 03:54 AM]

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