रेल के डिब्बे में रात होते ही गठरी हो जाता है आदमी

कवि कोकास हमारा समाज भी एक  रेल के डिब्बे की तरह ही है । आपने सोचा है कभी कि क्लास या वर्ग की अवधारणा सर्वप्रथम आम आदमी ने रेल के डिब्बे से ही जानी । यह भी अनायास नहीं हुआ कि एक ज़माने में थर्ड क्लास कहलाने वाला डिब्बा अपग्रेड कर सेकंड क्लास कर दिया गया ले... [पूरी पोस्ट]
writer शरद कोकास
views
73
upvote
6
downvote
0
rating
6
comments
25
[28 Nov 2009 02:09 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix