रेल के डिब्बे में रात होते ही गठरी हो जाता है आदमी
हमारा समाज भी एक रेल के डिब्बे की तरह ही है । आपने सोचा है कभी कि क्लास या वर्ग की अवधारणा सर्वप्रथम आम आदमी ने रेल के डिब्बे से ही जानी । यह भी अनायास नहीं हुआ कि एक ज़माने में थर्ड क्लास कहलाने वाला डिब्बा अपग्रेड कर सेकंड क्लास कर दिया गया ले...
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शरद कोकास
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[28 Nov 2009 02:09 AM]



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