प्रेत
विक्षिप्त सा जीता हूँ एक ठण्डी सी जिन्दगी और मर जा हूँ चुपचाप । होता है इतना सघन अँधेरा कि भटकती रहती है मेरी आत्मा तुम्हारी तलाश में शुरू से अंत तक ।...
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चंदन कुमार झा
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[27 Nov 2009 12:16 PM]



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