मुक्तक
मुक्तक बघनखे पहनए हुए, पुरोहित अपने गाँव के । शूल अब गड़ने लगे हैं अधिक अपने पाँव में । दूर तक है रेत और गर्म हवा के थपेड़े यहाँ पहुँच झुलसे सभी साने ठण्डी छाँव के । -रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' जीवन एक कला है । साहित्य उसी का सहज मार्ग है । सम्पूर्ण वि...
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सहज साहित्य
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[27 Nov 2009 11:20 AM]



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