वो परिंदे नए चहचहाते रहे
वैसे तो ये ग़ज़ल, आप से गुरु जी के ब्लॉग पे तरही मुशायेरे में रूबरू हो चुकी है. कुछ पुरानी भी हो गयी है मगर कहते है ना पुरानी चीज़ या कहें की ग़ज़ल और निखरती है तो इसी आस में इस ग़ज़ल को यहाँ ले आया. वैसे जब गुरु जी स...
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अंकित "सफ़र"
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[27 Nov 2009 03:38 AM]



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