एक गीत: जीवन के सुबह की....
एक गीत: जीवन के सुबह की.... जीवन के सुबह की लिखी हुई पाती मिलती है शाम ढले मुझको गुमनाम पूछा है तुमने जो मइया का हाल कमजोरी खाँसी से अब भी बेहाल लगता है आँखों में है मोतियाबिन बोलो तुम्हारी है कैसी ससुराल? चार-धाम करने की हठ किए बैठी खटिया पर पड़े-पड़े...
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आनन्द पाठक
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[27 Nov 2009 01:47 AM]



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